50 साल पहले की जीवनशैली और आज की आदतें: दिल की बीमारियों की असली वजह

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50 साल पहले की जीवनशैली बनाम आज की लाइफस्टाइल Dr. Siddhant Jain

50 साल पहले की जीवनशैली बनाम आज की जीवनशैली: दिल की सेहत का सच

मेरे पेशेंट्स मुझसे पूछते हैं कि साहब हम क्या खाएं, कितनी एक्सरसाइज करें, कौन-सी एक्सरसाइज करें, कब सोएं। तो मैं कहता हूं कि जो ह्यूमन बॉडी है, हमारी जो बायोलॉजी है, उसके पीछे एक थ्योरी ऑफ इवोल्यूशन है, डार्विन की, जो आपने कभी स्कूल में पढ़ी होगी। हम कहते हैं कि हमारे पूर्वज कौन थे – बंदर। बंदर चार पैरों पर चलते थे और उनसे इंसान बना, जो दो पैरों पर चला और सीधा चलने लगा। इस पूरे इवोल्यूशन में जो टोटल टाइम लगा है, वो है करीब 7 मिलियन ईयर्स, यानी 70 लाख साल। 70 लाख साल पहले से लेकर आज तक के हम, जिनको हम कहते हैं।

इवोल्यूशन और हमारी बॉडी का सच। - 50 साल पहले की जीवनशैली

इवोल्यूशन और हमारी बॉडी का सच।

होमोसेपियंस। मेडिकल टर्म्स में हम लोग होमोसेपियंस हैं। होमोसेपियंस बनने में 70 लाख साल लगे। उससे पहले दो पैरों पर चलना शुरू हुआ, फिर धीरे-धीरे बाल कम हुए, अलग-अलग स्पीशीज आईं, नियान्डरथल मैन आए, पहले केव में रहते थे, ब्रोंज एज आई। उसके बाद जो होमोसेपियंस बने, उसको भी सिर्फ एक या डेढ़ लाख साल ही हुए हैं। तो धीरे-धीरे आपकी बॉडी इवॉल्व हुई है – जंगल में रहने से, बंदरों वाली जीवनशैली से, इस जीवनशैली तक। मतलब आपका हार्डवेयर जो अपग्रेड हुआ है, वो 70 लाख साल में हुआ है, और आप इस हार्डवेयर को कैसे यूज कर रहे हो, वो कितनी तेजी से चेंज हुआ है पिछले 50–100 सालों में।

मेरे परदादाजी, मतलब मेरे पिताजी के दादाजी, हम लोग इंदौर के पुराने एरिया, क्लॉथ मार्केट एरिया में रहते थे। वहां सर हुकुमचंद सेठ होते थे, आपने नाम सुना होगा, जो इंदौर के नगर सेठ हुआ करते थे। मेरे दादाजी बताते थे कि उस समय, 1920–1940 के बीच, हुकुमचंद सेठ साल में दो या तीन बार – जैसे महावीर जयंती, दीपावली या उनके घर में कोई शादी-समारोह – मिठाई बनवाते थे और सबको देते थे। हम लोग भी साल में दो-तीन बार ही मिठाई खाते थे। बड़ा ऑकेजन होता था कि आज तो हुकुमचंद सेठ के घर फंक्शन है और आज मिठाई मिलेगी।

50 साल पहले की जीवनशैली और खान-पान।

आज आप देखिए, हर परिवार में – चाहे वो संपन्न हो, मिडिल क्लास हो या लोअर मिडिल क्लास – हर घर में शुगर, मिठाई, सॉफ्ट ड्रिंक्स, फास्ट फूड हर किसी को आसानी से उपलब्ध हैं। सब कुछ हर समय अवेलेबल है।

हमारा आज का स्टैंडर्ड नाश्ता है – सुबह उठे, जलेबी खा ली, पोहा खा लिया, मीठा खा लिया। इंदौर मिठाई के लिए फेमस है। तो इतनी एक्सेस में जब हमारी डाइट आ जाती है, तो बॉडी पर असर क्यों नहीं पड़ेगा? पहले इंदौर में गाड़ियां ही नहीं होती थीं। आज से 50 साल पहले बग्गियां चलती थीं और लिमिटेड गाड़ियां हुआ करती थीं। कार कुछ गिने-चुने लोगों के पास होती थी। 50–60 साल पहले महाराजाओं के पास कार होती थी। आज इंदौर में जितने लोग नहीं हैं, उससे ज्यादा गाड़ियां हैं – टू-व्हीलर, फोर-व्हीलर बहुत ज्यादा हैं।

50 साल पहले की जीवनशैली लोग पैदल चलते थे, व्यायाम करते थे, दिन भर चलते-फिरते रहते थे। जो नेचुरल फूड होता था, जो अन्न, सब्जियां और प्राकृतिक तरीके से मिलने वाला खाना होता था, वही खाते थे। प्रोसेस्ड फूड, फास्ट फूड नहीं होता था। बहुत ज्यादा तला-भुना, शादी समारोह में बनने वाला भारी ग्रेवी वाला खाना रोजमर्रा में नहीं खाया जाता था। फिजिकल एक्टिविटी ज्यादा होती थी।

पहले की सक्रियता और आज की सुस्ती - 50 साल पहले की जीवनशैली

पहले की सक्रियता और आज की सुस्ती।

पहले लोग जल्दी सो जाते थे, क्योंकि एंटरटेनमेंट का कोई सोर्स नहीं था। न टेलीविजन था, न कंप्यूटर, न मोबाइल। तो आज से 50 साल पहले लोगों के पास एंटरटेनमेंट का कोई ऑप्शन नहीं था। लोग 8–9 या 10 बजे तक सो जाते थे और सुबह उजाला होते ही उठ जाते थे। उनकी लाइफस्टाइल – कब सोना है, कब उठना है – वो उनके नेचुरल इवोल्यूशन से मैच करती थी। शायद इसलिए भी लोग जल्दी सो जाते थे, क्योंकि उस समय हार्ड वर्क ज्यादा होता था। फिजिकल वर्क की वजह से थकान होती थी और बॉडी अपने आप रेस्ट मांगती थी।

कुर्सी-केंद्रित जीवन और बीमारियां।

और अब क्या है? हार्ड वर्क कम हो गया है। हम इस कुर्सी पर बैठे हैं। यह कुर्सी हमारे बैठने के लिए नहीं बनी है। भगवान ने इसे बना के नहीं दिया। भगवान ने आपको खड़े रहने और सोने के लिए बनाया है। आज आप दिन भर कुर्सी पर बैठे रहते हो – गाड़ी में बैठे हो, ऑफिस में बैठे हो, स्कूटर पर बैठे हो, डाइनिंग टेबल की कुर्सी पर बैठे हो, सोफे पर बैठे हो, या फिर सो जाते हो। मतलब दिन भर बैठना ही बैठना, चलना-फिरना खत्म।

फिर लोग कहते हैं – साहब, आजकल बैक पेन बहुत हो रहा है, ब्लड प्रेशर बहुत हो रहा है। तो अगर आप नॉर्मल, नेचुरल बॉडी को, जो भगवान ने हार्डवेयर के रूप में दी है, उस पर लेटेस्ट सॉफ्टवेयर चला दोगे, तो दिक्कत तो आएगी। 70 लाख साल में बना हुआ हार्डवेयर, और पिछले 50–100 सालों में बदला हुआ सॉफ्टवेयर – हमारा वर्जन पिछले एक-डेढ़ लाख साल से बदला ही नहीं है।

होमोसेपियंस 2.0 तो है, लेकिन सॉफ्टवेयर पिछले 200–300–400 सालों में, और खासकर पिछले 10–20–30 सालों में बहुत तेजी से बदल गया है। इंडस्ट्रियल रेवोल्यूशन 200–300 साल पहले आया, फैक्ट्रियां बनीं, गाड़ियां बनीं। 100 साल पहले लोगों ने गाड़ियां देखना शुरू किया, एयरप्लेन आए। और पिछले 20–30 सालों में मोबाइल आ गया। अब चलना-फिरना कितना कम हो गया है। घर में भी किसी को आवाज लगानी हो, तो मोबाइल लगा देते हैं। यहां तक कि घरों में लोग लिफ्ट लगाने लगे हैं।

ये सब हमारी एक्टिविटी लेवल को बहुत कम कर रहा है। एक्टिविटी लेवल कम हो रहा है, खान-पान पूरी तरह बदल गया है, प्रोसेस्ड फूड ज्यादा लिया जा रहा है। और नींद – हमारी जो बायोलॉजी है।

नींद और शरीर की घड़ी में समन्वय। - 50 साल पहले की जीवनशैली

नींद और शरीर की घड़ी में समन्वय।

हमारे ब्रेन में एक क्लॉक होती है, जिसे बॉडी क्लॉक या बायोलॉजिकल क्लॉक कहते हैं। वो सूरज के साथ सेट होती है। जिस जगह, जिस देश में आप रह रहे हो, वहां सूर्योदय और सूर्यास्त के हिसाब से आपको उठना, सोना और खाना-पीना चाहिए। लेकिन हमने सब कुछ बदल दिया है। इंदौर में अगर 7 बजे सूर्यास्त हो रहा है, तो 7 बजे के बाद लोगों की लाइफ शुरू होती है। लोग नाइट क्लब जाते हैं, घूमने जाते हैं, बाहर खाने-पीने जाते हैं। 11–12 बजे तक होटल खुले रहते हैं। 2 बजे लोग सोते हैं, सुबह 10–11 बजे उठते हैं, और फिर कहते हैं – साहब, हमें बीमारियां क्यों हो रही हैं?

हार्ट स्पेशलिस्ट डॉ. सिद्धांत जैन का कहना है, जितना आप खुद को नेचर से अलाइन करोगे, जितनी आपकी लाइफस्टाइल भगवान द्वारा दी गई नेचुरल लाइफस्टाइल के करीब होगी, उतना आप हेल्दी रहोगे। आप सोचो – चिंपांजी या बंदर को क्या खाने को मिलता है, वो कब सोते हैं, कितना चलते हैं, कितनी एक्सरसाइज करते हैं। अगर आप ये सब सोचेंगे, तो अपनी लाइफस्टाइल को हेल्दी लाइफस्टाइल के साथ ज्यादा अच्छे से अलाइन कर पाएंगे।

कुल मिलाकर हमने कंफर्ट के चक्कर में अपनी लाइफस्टाइल को डिस्ट्रॉय कर लिया है। Comfort is a very big enemy of longevity.

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